Friday, July 8, 2016

हिन्दी में विश्व भाषा बनने की सामर्थ्य + रमेशराज

हिन्दी में विश्व भाषा बनने की सामर्थ्य
                                                                      + रमेशराज
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शब्द का सम्बन्ध सोच-विचार , चिन्तन-मनन से होने के कारण भाषा केवल हमारे रागात्मक सम्बन्धों की संवाहिका ही नहीं होती, हमें परिमार्जित और संस्कारित भी करती है। संस्कृति के निर्माण में भाषा की ही अहं भूमिका होती है। हिन्दी संघ की राजभाषा बनने से पहले ही भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी अमीर खुसरो , चंदबरदायी के समय से अपनी शब्द सम्पदा को समृद्ध करते हुए , अपने रूप-स्वरूप को इस तरह सॅवारती चली आ रही है कि यह भारतीय समाज के शिक्षित , अशिक्षित , शहरी , ग्रामीण अर्थात् सभी वर्गों के बीच संवाद , अभिव्यक्ति और रागात्मकता को प्रगाढ़ करती हुई उत्तरोत्तर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है।
     सर्वाधिक सुखद संकेत यह है कि हिन्दी बोलने वालों की सख्या आज विश्वभर में सर्वाधिक है। पूरे विश्व में पहले चीनी अर्थात् मंडारिन बोलने वाले जनसंख्या में आगे होने के कारण सर्वोपरि थे किन्तु अब हिन्दी बोलने समझने लिखने पढ़ने वालों की संख्या सर्वाधिक है। पूरी दुनिया में हिन्दी को अभिव्यक्ति का माध्यम अपनाने वालों की संख्या एक अरब से भी अधिक है। अंग्रेजी को मातृभाषा के रूप में अपनाने वाले मात्र पेंतीस करोड़ हैं । पर दुर्भाग्य देखिए अंग्रेजी अल्पसंख्यक भाषा होने के बावजूद विश्वभाषा उन सफेदपोश वर्ग के कारण बनीं हुई है जो वोट हिन्दी में मांगते आ रहे हैं किन्तु अपना सारा राजकाज अंग्रेजी में चलाने को आतुर रहते हैं । अंग्रेजी हमारे शासक प्रभुओं की भाषा है , अतः हिन्दी राष्ट्रभाषा  का गौरव प्राप्त करने के लिए आज भी तरस रही है।
      हिन्दी को राजभाषा तक ही सीमित रखने का यह राजनितिक षड़यंत्र अधिक समय तक नहीं चल सकता क्योंकि इसी शासक वर्ग को एक न एक दिन मानना-स्वीकारना पड़ेगा कि ज्यों-ज्यो भूमंडलीकरण बढे़गा , व्यापार और बाजार के लिए हिन्दी को ही वरीयता इसलिए देनी पड़ेगी क्योंकि सर्वाधिक उपभोक्ता हिन्दी भाषी हैं।
     हिन्दी की लिपि देवनागरी वैज्ञानिक और सरलता से सीखी जाने वाली लिपि है। हिन्दी का हर अक्षर अपने आप में एक शब्द है जो एक निश्चित अर्थ को भी अपने आप में समाहित किये है , जैसे ‘अ’ का अर्थ नहीं , ‘द’ का अर्थ ‘देने वाला’। जबकि अंग्रेजी के अधिकांश अक्षर निरर्थक हैं। हिन्दी में जो बोला जाता है वही देवनागरी लिपि में लिखा जाता है। कम्प्यूटर के लिए देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता असंदिग्ध है। जरूरत इसे लागू करने की है। सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि विश्व में सर्वाधिक बोली जानें वाली भाषा हिन्दी विश्व की तीन हजार भाषाओं में से इकलौती भाषा इसलिए बन गयी है क्योंकि इसने लोकभाषा , फारसी , अरबी , अंग्रेजी आदि से शब्द ग्रहण कर अपने आप को व्यापक बनाया है। इसी भाषा ने कॉमेडी और ट्रेजडी तक सिमटने वाली रसतालिका को नौ रस दिये हैं, अन्य रस बढ़ायें हैं। हिन्दी भाषा की उपभाषाओं मैथली , भोजपुरी , बुन्देली , राजस्थानी , ब्रज , उर्दू आदि को इससे अलग करने के षड़यत्र यदि रुक जायें तो हिन्दी को विश्वभाषा बनने में देर नहीं लगेगी।
     हिन्दी आज पत्र-पत्रिका , न्यूज चैनल्स , टी. वी. सीरियल्स , फिल्मों , नाटकों में ही नहीं धड़कती, दुनिया के सौ से अधिक विश्वविधालायों में पढ़ायी जाती है। विदेशी कृतियॉं जैसे ‘ हैरीपोटर ’, सूटेबल ब्वाय ’, द ‘ सेकण्ड सैक्स ’ आदि हिन्दी में अनुवादित होकर दुनिया में धूम मचा रही हैं। हिन्दी आज हिन्दुस्तान में ही नहीं चीन , अमेरिका , फ्रॉस , रूस , आस्ट्रेलिया , इण्लेंड , जापान आदि में भी सीखी-पढ़ी-बोली जा रही है। भले ही ऐसा बाजारवाद के कारण हो , लेकिन यह कटुसत्य है कि हिन्दी विश्वभाषा बनने जा रही है।
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रमेशराज,  15/109 ईसा नगर निकट थाना सासनी गेट अलीगढ़
        मोबाइल - 9634551630


निराला का व्यवस्था से विद्रोह +रमेशराज


निराला का व्यवस्था से विद्रोह

+रमेशराज
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    क्रान्तिकारी, फक्कड़ और निर्भीक महात्मा कबीर के बाद यदि कोई कवि उनके समतुल्य, व्यवस्था-विरोधी, साहसी और नैतिक मूल्यों को सर्वोपरि मानकर, उनकी स्थापनार्थ संघर्षरत रहा है तो वह नाम है-महाप्राण सूर्यकांत त्रिापाठी ‘निराला’।
    ‘निराला’ एक ऐसे कवि हैं, जिन्होंने गुलाम हिन्दुस्तान में अंग्रेजों के दमनचक्र में पिसती, सिसकती, विलखती जनता को जार-जार और तार-तार होते देखा है तो स्वतंत्रता के बाद के काल के शासकों की वे कुनीतियां भी महसूस की हैं, जो अंग्रेजों के साम्राज्य-विस्तार का आधार थीं। स्वतंत्र भारत के अपने ही शासन में, अपने ही शासकों के चरित्र से अकेले ‘निराला’ का ही मोहभंग हुआ हो, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’, सुमित्रानंदन पंत जैसे उनके समकालीन कवि भी कांग्रेस और गांधीजी की कथित अहिंसा और थोथे समाजवाद के व्यामोह से छिटककर वास्तविकता के उस धरातल पर आ जाते हैं, जहां आजादी और सामाजिक समरसता का सपना चूर-चूर होकर बिखर जाता है। दिनकर कह उठते हैं-
‘‘ अबलाओं को शोक, युवतियों को विषाद है
बेकुसूर बच्चे अनाथ होकर रोते हैं
शान्तिवादियो! यही तुम्हारा शांतिवाद है?’’
    सुमित्रानंदन पंत उस समय के कांग्रेसी चारित्रिक पतन को एक व्याधि के रूप में इस प्रकार उजागर करते हैं-
‘‘ धिक यह पद-मद शक्ति मोह!
कांग्रेस नेता भी मुक्त नहीं इससे
कुत्तों से लड़ते कुत्सित भारत माता की हड्डी हित!
आज राज्य भी अगर उलट दे जनता,
इतर विरोधी दल के राजा इनसे अधिक
श्रेष्ठ होंगे? प्रश्नास्पद!
क्योंकि हमारे शोषित शोणित की यह नैतिक
जीर्ण व्याधि है।’’
मुद्दा चाहे भ्रष्टाचार का हो या आजादी के बाद आये कांग्रेस के उस असली शोषक, अनैतिक, कायर और भोगविलासी आचरण के उजागर होने का हो, जिसे देखकर उस समय कई कवि आशंकित ही नहीं, क्षुब्ध और आक्रोशित हो उठे थे, इन कवियों से अलग ‘निराला’ की प्रतिक्रिया बेहद तीखी, मारक और व्यवस्था के प्रति विद्रोह से भरी हुई, उनकी कविताओं के माध्यम से स्पष्ट अनुभव की जा सकती है। मुद्दा चाहे हरिदास मूंदड़ा के भ्रष्टाचार का हो या ‘हिन्दी-चीन भाई-भाई’ के नारे के बाद हुए भारत पर चीन के आक्रमण का, इन सभी मुद्दों पर वे कांग्रेस की शासन-प्रणाली को असफल मानते हुए इसके लिये जिम्मेदार केवल नेहरू को ठहराते हैं। प्रतीकों के माध्यम से ‘निरालाजी’ की सशक्त कलम से प्रसूत उनकी ‘बेला’, ‘नये पत्ते’ और ‘कुकुरमुत्ता’ शीर्षक रचनाओं में कांग्रेस की दोहरे चरित्र और घृणित मानसिकता की झलक देखते ही बनती है। उनकी ‘कुकुरमुत्ता’ नामक रचना दलित वर्ग की प्रतिनिधि कविता है, जिसकी व्यंग्यात्मक शैली उस शोषक चेहरे की पर्तें उधेड़ती चली जाती है जो समाजवाद का मुखौटा लगाकर जन-जन के बीच लोकप्रिय और ग़रीब जनता का सच्चा हितैषी बनना चाहता है। ‘निराला’ इस शोषक चेहरे की पहचान कराते हुए उसे इस प्रकार धिक्कारते हैं-
अबे सुन बे गुलाब
भूल मत गर पायी
खुशबू, रंगो-आब
खून चूसा खाद का
तूने अशिष्ट
डाल पर इतरा रहा
कैपिटलिस्ट।
    जिस चारित्रिाक पतन से आज कांग्रेस गुजर रही है, उसका वह निर्मम आचरण बढ़ती महंगाई, हवाला कारोबार, 2 जी स्पेक्ट्रम, आदर्श सोसायटी, काॅमनवेल्थ गेम के घोटालों के रूप में सामने आ रहा है। कांग्रेस की जनता का शोषण कर अकूत सम्पत्ति अर्जित करने की ललक या कुत्सित इच्छा को निराला ने नेहरूकाल में ही भांप लिया था।
उत्पीड़न का राज्य,
दुःख ही दुःख 
अविराम घात-आघात
आह उत्पात
    निराला की पक्षधरता आमजन के साथ रही। सत्ता के स्वार्थ, सम्मान और पदकों की लालसा से परे वे जन के मन के क्रन्दन को वाणी देते रहे-
अपने मन की तप्त व्यथाएं
क्षीण कण्ठ की करुण कथाएं
    निराला-रचित कविता ‘वह तोड़ती पत्थर’ में दीन-दुखी निर्धन नारी का जो मार्मिक चित्र उन्होंने प्रस्तुत किया है, उससे सर्वहारा वर्ग के प्रति एक करुणामय झलक मिलती है-
वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर।
गुरु हथौड़ा हाथ
    करती बार-बार प्रहार
सामने तरुमालिका, अट्टालिका, प्राकार।
उपरोक्त कविता में जिस असमानता और निर्धन वर्ग की दीनता का जिक्र ‘निराला’ ने किया है, वह असमान, असंगतिभरा विकास आज हमें उदारीकरण की वैश्विक नीति के इस दौर में अपनाये जाने वाली आर्थिक नीतियों के रूप में फलता-फूलता दिखायी दे रहा है। सत्ता के जनघाती चरित्र और पूंजीवादी गठजोड़ को लेकर कविता के माध्यम से जो संकेत प्रसिद्ध कवि सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ ने दिये थे कि -
‘‘देश के वही आदमी करीब है,
जो या तो मूर्ख है या गरीब हैं’
    उनके इस कथन का रहस्य आज राडिया टेपों के माध्यम से समझा जा सकता है। इसी तरह के देशद्रोही चेहरों की पहचान महाप्राण सूर्यकांत त्रिापाठी निराला ने नेहरू-काल में इस प्रकार बतायी है-
विप्लव रव से शोभा पाते
अट्टालिका नहीं हैं रे
आतंक-भवन।
    निष्कर्षतः निरालाजी अपनी रचनाओं में अपने तत्कालीन परिवेश का ही जिक्र नहीं करते, वे उस दुराचार, पापाचार, भ्रष्टाचार और देशद्रोह की ओर भी भविष्यवाणी-सी करते महसूस किये जा सकते हैं, जो वर्तमान में  प्रधानमंत्री की अकर्मण्यता और भ्रष्टाचारियों पर कोई कार्यवाही न करने के रूप में देखा जा सकता है।
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001


रमेशराज एक जुझारू व्यक्तित्व +दर्शन बेज़ार


रमेशराज एक जुझारू व्यक्तित्व    

 +दर्शन बेज़ार
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    लगभग तीस-बत्तीस वर्ष पूर्व सन् 1981 से 1985 तक तैनाती संयोगवश अलीगढ मुख्यालय पर हो गई। जयगंज के डॉ. अशोक अग्रवाल जो स्वयं भी ख्यातिप्राप्त लघुकथा लेखक रहे हैं, मेरे पारिवारिक चिकित्सक थे, उनके पास प्रायः आना जाना होता था। उनके क्लीनिक पर ‘तेवरीपक्ष’ [त्रैमा.] की एक प्रति पढ़ने को उठाली | मुख्यपृष्ठ पर ही एक तेवरी रचना छपी हुई देखकर डाक्टर साहिब से वह अंक पढ़ने के लिए घर ले आया, अंक क्या पढ़ा, एक-एक तेवरी मन में उतरती चली गई।
मेरे अनुरोध पर डाक्टर साहब ने तेवरीपक्ष के संपादक भाई रमेशराज से मिलवा दिया | बैठकें होने लगीं, उस समय साहित्य में उभरती रचनाधर्मिता पर गंभीर चर्चाएं भी होने लगीं , कई अन्य तेवरी लेखकों से भी विचारविमर्श होने लगे। तेवरी अन्दाज में मैं भी कुछ-कुछ लिखने लगा। वैसे छात्र जीवन में सन् 72 तक मैं अन्य प्रकार की रचनाएं लिखता अवश्य था, किन्तु उनमें तेवर न होकर परिस्थितियों पर निराशा ही परिलक्षित होती थी | कुछ रोमानी ग़ज़लें भी लिखी थीं, किन्तु सेवा में आने पर लिखना प्रायः छूट-सा गया था तथा पारिवारिक उत्तरदायित्वों तक ही दिनचर्या सीमित रह गई थी। इस बीच मेरे अभियंता साथी भाई सूरज सिंह  पाल ने  मुझसे कहा कि हास्यसम्राट तथा अभिनेता शैल चतुर्वेदी जी उनके अभिन्न मित्र हैं, वे चाहते हैं कि उनका अभिनन्दन अलीगढ़ जनपद के सभी अभियंताओं की ओर से किया जाना चाहिए। मैंने इस प्रस्ताव पर आगे और जोड़ दिया कि कविवर नीरज तथा शैल चतुर्वेदी दोनों का ही एक साथ अभिनन्दन दिया जाना उचित रहेगा। सभी अभियन्तागण जो लोकनिर्माण विभाग अलीगढ़ में कार्यरत थे, ने अपनी सहमति दे दी और श्री नीरजजी तथा शैल चतुर्वेदी जी से वार्ता करके 30 नवम्बर 1983 की तिथि निर्धारित की। उत्तर भारत के तत्कालीन कवि यथा लोकप्रिय  कुंवर  बैचेन, डॉ. शशि तिवारी, उदय प्रताप को भी कवि सम्मेलन में भाग लेने हेतु आमंत्रित किया। नीरज जी प्राय बाहर कार्यक्रमों में व्यस्त रहते थे। घर जाने पर उनसे भेंट न हो पाती थी तो डॉ. रवीन्द्र भ्रमर के घर की ओर चला जाता था। उनसे हिन्दी, कविता पर घण्टों वार्ता होती रहती थी। बहुत ही ज्ञान प्राप्त होता था। उनसे वार्ता करने से एक मीटिंग में उनसे तेवरी नाम [उभरते हुए नाम] पर चर्चा की तो उन्होंने तेवरी विधा को जन-जन के आक्रोश को समाहित किये हुए कुछ कर गुजरने का संदेश देने वाली विचारधारा बताया, यहाँ तक कि उन्होंने एक साक्षात्कार में तेवरी को ‘शंकर के तृतीय नेत्र’ की संज्ञा भी दी। किन्तु यह भी आगाह कर दिया कि भविष्य में तेवरीकारों को ग़ज़लकारों के विरोध का सामना भी करना पडे़गा।
    आचार्य रवीन्द्र भ्रमर के आशीर्वाद तथा रमेशराज का सहयोग पाकर सन् 1972 से छूटा हुआ लेखनक्रम कुछ-कुछ प्राप्त हो गया | मैंने सन् 1975 से अपने आप को तेवरी नामक विधा की जंजीरों में जकड़ लिया है। यदा-कदा दो-चार टूटे-फूटे शब्द जोड़ लेने का साहस कर बैठता हूँ। सन् 1985 में एक स्वतंत्र संग्रह ‘एक प्रहार लगातार’ प्रकाशित हुआ। किसी ईर्षालु ने कोई खुराफात कर दी तथा कथित एल.आई.यू. के इन्सपेक्टर व दो व्यक्ति रमेशराज के घर आकर बोले कि इस संग्रह में एक जगह व्यवस्था विरोध शब्द छपा है। यह पुस्तक जब्त की जा सकती है। उनको पुलिसिया अन्दाज में धमकाया भी। किन्तु यह जब्त नहीं हो सकी है। अब तक रमेशराज की हिम्मत पस्त नहीं हुई। वे बराबर इसी प्रकार का प्रकाशन जारी रखे हुए हैं । रमेशराज एक ऐसे जुझारू तथा लोकप्रिय जनकवि की सन्तान हैं जो अपने जीवनकाल में ब्रजमण्डल में प्रचलित जिकड़ी रसिया विधा के पुरोधा थे। उनके पिता श्रीरामचरन गुप्त तेवरीपक्ष त्रैमासिक के प्रथम सरंक्षक के रूप में सर्वप्रथम आगे आये | उनके पिता का ही प्रभाव था कि रमेशराज अलीगढ़ के गंगाजमुनी वातावरण में, गीत-ग़ज़ल, बाल कविता के साथ-साथ समीक्षा के क्षेत्र में भी एक सशक्त नाम बनकर उभरे हैं। प्रथम द्वितीय- चतुर्थ, पष्ठम अष्ठम पंक्तियों में तुकान्त लेकर लिखी-जाने वाली हर रचना को ग़ज़ल कहने को आतुर रहे तथाकथित ग़ज़लकारों की ग़ज़ल के कथ्य तथा शिल्प पर बेवाक टिप्पणी करने की अटूट क्षमता है रमेशराज में। साहित्प में रस की निष्पत्ति पर छपे उनके संग्रह ‘विरोधरस’ ने रसों के रूपों पर प्रभावशाली लेखनी चलाई है।
    ‘विरोधरस’ को लेकर एक नए रस की सार्थकता पर प्रकाश डाला है, इस शोधपरक पुस्तक पर कई विद्वानों ने अपने-अपने स्तर से समर्थन किया है। लम्बी तेवरियाँ ‘दे लंका में आग’ तथा ‘जै कन्हैयालाल की’ न केवल कुव्यवस्था पर करारा व्यंग हैं,  बल्कि नए समाज की रचना करने के लिए शाश्वत प्रयास कही जाएंगी। अनेक विरोधों के बावजूद रमेशराज अथक तथा निर्भीक भूमिका निभाते हुए आज भी अपने अभीष्ट पथ पर चल रहे हैं। वे अपनी सटीक दलीलों, लेखों के माध्यम से साहित्य में चापलूसी, विदूषकों, फूहड़ अभिव्यजनाओं पर सार्थक प्रहार करते हुए लोलुप साहित्यकारों को समय-समय पर सचेत करते आ रहे है। रमेशराज जी का स्वाभिमानी व्यक्तित्व भी विशिष्टिता लिए हुए है। अपने सीमित साधनों, व्यक्तिगत वचत के माध्यम से ही वे तेवरीपक्ष [त्रैमा] तथा अन्य प्रकाशन करते चले आ रहे हैं। विज्ञापन या किसी अन्य सहायता हेतु कभी भी उन्होंने किसी विज्ञापनदाता, अधिकारी या संस्था या नेता के आगे-पीछे  चक्कर नहीं लगाए तथा न ही कभी हाथ फैलाया है।


जनकवि रमेशराज +क्षेत्रपाल शर्मा



            

जनकवि रमेशराज          

+क्षेत्रपाल शर्मा
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पेलग्रेव ने 1861 में जो ‘गोल्डन ट्रेजरी’ लिखी उसमें जानउन, शेक्सपीयर और बिहटमेन के कई ‘सानेट’ व गीत शामिल नहीं किए गए थे, मात्रा ‘लय’ आदि के कारण। लेकिन ठीक 100 साल बाद आस्कर विलियम्स के संपादकत्व में छपी ‘‘गोल्डन ट्रेजरी’’ में पेलगे्रव के संकीर्ण सिद्धान्त [माइनर पिंरसीपल्स] से  विपथ हो गए और ऐसी कविताएँ भी शामिल की गई जो ब्लेन्कवर्स या फ्रीन्वर्स में थीं।
मेरे उक्त लिखने का प्रयोजन ‘तेवरी’ से है। तेवरी को कुछ ग़ज़ल या ग़ज़ल-जैसी बता रहे हैं। इस संबंध में स्वयं तेवरीकार श्री रमेशराज जी ने कहा किः ‘‘तेवरीः आम आदमी की जिन्दगी में घुली तल्खियत का ब्यौरा है।’’ इस शीर्षक से कवि ने सविस्तार बताया है। जो तथ्य दिए हैं वे ग्राहय हैं और उनसे हर एक सहमत होगा।
    वस्तुतः जब चीजें गुटबंदी में फंस जाती हैं, तो चाहे-अनचाहे भी बहुत बड़े अधर्म हो जाते हैं। इस विषय पर मैं ज्यादा नहीं बोलूँगा, प्रलेस, जलेस, दलित विमर्श, स्त्रीविमर्श | आलोचकों की तरफ से मैं ध्यान दिला रहा हूँ बटरोही नैनीताल, श्री वी.एन.राय या इलेन्दे की रचना ‘टाड्स माउथ’ का हिन्दी अनुवाद छाप देना। प्रतिभाशाली कवि या व्यक्तियों को किनारे करना शुभ नहीं है। वस्तुतः ह्यूमैनिटीज विषय पर जैसा काम ‘‘रूपकथा जर्नल’’ या  प्रोफेसर लिसा स्वानस्ट्रोम ने किया वैसा हिन्दी साहित्य में देखने को [ सोच और विचार दोंनों ही दृष्टियों से ] मिल नहीं रहा है। मैं तो सिर्फ झकझोर ही सकता हूँ। डिजीटल और इलेक्ट्रानिक युग में पहुंचे [ मैं फेसबुक, ट्विटर की बात नहीं कर रहा ] पिछड़ापन कब तक?
दो वर्ष पूर्व मैं स्थानीय इन्टर कालेज [ के.पी. इन्टर का. अलीगढ़ ] में श्री नीरजजी के जन्म समारोह में गया था। लौटते वक्त कुछ समय श्री रमेशराजजी के पास उस दिन बिताया।
मैंने उस दिन नीरजजी के ‘नास्तिक’ होने की बात बताई, इस पर जन-कवि श्री रमेशराज जी ने कहा कि’’ वे [ नीरज जी ] अपनी रचना में मानवता के प्रति अति-संवेदनशील हैं, वे नास्तिक नहीं हैं। आस्तिक किसे माना जाए? जो अपनों से दगा करता हो गला काटता हो?’’ बात भी उनकी सही थी।
मैं 34 वर्ष अलीगढ़ से बाहर रहा हूं। रमेशराजजी से सन् 2010 में ही परिचय के बाद, ज्ञात हुआ, मेरे पड़ोसी गांव के हैं। सुसंस्कार, मिलनसार और कवि-हृदय। बचपन में, मैंने एक-दो फूलडोल भी देखे हैं। श्री रमेशराज जी के पिता श्री रामचरन गुप्तजी की फूलडोलों में धाक थी। श्री खेम सिंह नागर जैसे जनकवियों के साथ, फूलडोलों में सम्मिलित होना ही नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका में रहना बहुत महत्वपूर्ण होता है।
सोना सोना होता है, चमक हो यह बहुत जरूरी नहीं हैं। आज गुटबंदी और अनंत-जी-हुजुरी के माहौल में कोई व्यक्ति कवि बनकर निर्वाह कर ले, इससे बड़ा कष्टप्रद माहौल हो नहीं सकता। अब फूल-डोल बंद से ही हैं जो श्रुति-स्मृति की परंपरा और ‘हिन्दी रेनाइसां’’ का या स्पष्ट शब्दों में कहूं तो ‘जन कवियों’ जैसे खेमसिंह नागरजी, रामचरन गुप्तजी के दिनों वाला समय बीत चुका।
मैं ऐसे पाठकों का प्रशंसक हूं जो समय से पूर्व ही ‘पक’ [ अनुभव से ] जाते हैं, बुद्धिमान हैं। सच तो यह है कि आप ‘अंदर’ की बात तो अंदर पहुंचकर ही जान पाते हैं।
साधारणतया सरकार में पद बहुत अहम होता है। पदों की कई श्रेणियां हैं। कई तो ‘कर्नल’ और ब्रिगेडियर’ का फर्क नहीं समझ पाते। कई ‘स्व-नियंत्रित’ के  मातहत अधिकारी का फर्क नहीं समझ पाते। जैसे ‘उच्च न्यायालय’ का मुख्य न्यायाधीश एवं सर्वोच्च न्यायालय का न्याधीश। समान- जैसे-लगने वाले पदों में भारी असमानताएं हैं। काम के हिसाब से यह पद्दति प्राकृतिक एवं सही है। जन-साधारण में भी यह साक्षरता बढ़े, ताकि आपसी सद्भाव एवं आदर परस्पर युक्तियुक्त हो। यही स्थिति मैं कवियों के बीच देखना चाहता हूं।
व्यक्ति अपनी विधा में ‘जीनियस’ हो सकता है, लेकिन कई अन्य क्षेत्रों में, देखा जाता है कि वह कमजोर प्रदर्शन करता है। प्राकृतिक नियम से संगत जो मानव-निर्मित नियम होंगे, वही तार्किक होंगे। जैसे फौजी व पुलिसवालों से बस्ती में आंख-की-सीध में चलने एवं जनता से नम्र व्यवहार, सचाई, ईमानदारी के निर्देश हैं, फिर भी कोई इस कर्तव्य को न समझे तो उसकी अपनी मंशा है। वह ऐसा कर क्यों रहा है, परिस्थिति-वश या प्रवृत्तिवश? प्रवृत्तिवश ही पाप है अपराध है।
अब, मूल विषय पर ही लौट आता हूं। तेवरी एक विधा है, वह भी स्वतंत्र। अब इसमें रचनाएं उपलब्ध है। यह न दोहा है, और न ही ग़ज़ल। कुछ तेवरियों का रसस्वादन भी करना ठीक रहेगा-
ऊधौजी जिसे भी मित्र कहते हैं आज हम
चले है कुटिल चाल, जै कन्हैयालाल की। नीति है कमाल की ||
सेब संतरे का जूस आज है कसैली चीज,
कोक ने कि कमाल जै कन्हैयालाल की। नीति है कमाल की ||
तेवरी विरोध-भरी वर्णिक छंद में
आज तेवरों में ज्वाल, जै कन्हैयालाल की। नीति है कमाल की ||
जन-कवि रमेशराजजी ने सपरी और अन्य लोकप्रिय प्रचलित विधा को अपनाकर लांगुरिया से ‘दे लंका में आग’-
मुझमें- मुझुमें बस इतना ही अंतर है
मैं माचिस बारूद बना तू लांगुरिया। गाल छर असुरों के ||
आज कंस का मित्र बना मुरलीधर है,
इस रिश्ते से खुश है क्या तू लांगुरियां। गाल छर असुरों के ||
जो रचना शाश्वत मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठापित करती है वही कालजयी होती है। इन तेवरियों में इन्हीं बातों को मुखरित किया गया है।
    मुझे इनमें किसी रंग-हरा नीला आदि इत्यादि किसी का प्रभाव नहीं लगा।